That unsaid Romance..

हम कुछ यूँ ही खड़े थे⁣
दीवाने आशिकों की तरह बेफ़िक्री में⁣

इन्तज़ार था उन लम्हों का⁣
जो रोज़ आते हैं⁣
हम उन्हें देखते हैं, वो हमें⁣
बिन कहे भी बहुत कुछ बतियाते हैं⁣

पर आज तो पहरा लगा था ⁣
छोटे बड़े परदों का⁣
कुछ सियाहे से, कुछ झीने से⁣

पर हमें उम्मीद थी⁣
कि दीदार-ए-जश्न होगा⁣
कुछ बातें होंगी⁣
फिर जाके तसल्ली से रुख़सत होगी⁣

वो आयीं⁣
ज़रा मुस्कुरायीं⁣
लफ़्ज़ों से तो कुछ न कहा⁣
पर आँखों की चमक छुपा न पायीं⁣

चंद लम्हें हमें मिल गए⁣
एकटक हम निहारते ही रह गए ⁣
कुछ कह न सके, बस बुत बन गए ⁣

वो हँसीं, शायद थोड़ा शरमायीं⁣
फिर कल आउँगी कह,⁣
धीरे से अपनी ओढ़नी उठाई⁣

हमें लगा चलो खेलेंगे अब आँख-मिचौली⁣
पर वो हो गईं रुख़सत⁣
छोड़ गईं एक लकीर सी,⁣
वो भी न रुकी⁣

पर हमें मालूम था कल वो फिर आएंगी⁣
हम फिर यूं ही खड़े होंगे⁣
बुत से… ⁣⁣
⁣⁣
To my friends who don’t understand Hindi: Sometimes feelings strike in certain languages. That’s the curse of the multilingual world.⁣⁣
⁣⁣
It’s an ode to evening. May be I’ll write about it in English too someday. ⁣⁣

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *