वो हमारे अपने ना थे?

वो  हमारे अपने ना थे
पर वो पराए भी तो ना थे
रहते हमारे साथ ना थे
पर इसी दिल में थे, कहीं दूर तो ना थे
 
पर वो हमारे अपने ना थे  
फिर क्यों यह दिल तड़पता है
रोता है, सिसकता है?
 
क्यों ये आँखें तरसतीं हैं
बार बार ख़बरों को खँगालतीं हैं
क्या जाने कुछ ग़लत पढ़ा हो
कुछ ग़लत देखा हो
ग़लत सुना हो 
समझा हो?
 
कभी सच को सुनना नहीं चाहते
कभी सुन नहीं पाते
फिर उठती है एक लहर
झींझोड़ जाती है
निकल जाती है, एक सुई की नोक कि तरह
 
पर वो हमारे अपने ना थे
कहता है कौन?
वो जिसने आखें बंद कर उन आखों का दीदार ना किया
जिसने सपनों में इश्क़इज़हार ना किया
जिसके लबों पे उनकी मुस्कान छप ना गयी
या वो जिसने जीना ही ना सीखा?
 
वो उम्र थी, वो दौर था
जब उन्हें देख कर जीना सीखा
उनें देख कर हँसना सीखा
उन्हें देख कर ग़म भुलाया
और उन्हें ही देख कर ख़ुशियाँ समेटीं
 
कैसे भूल जाएँ उस दौर को
वो आख़िर हमारा अपना था
वो सपने हमारे अपने थे
वो यादें हमारी अपनी हैं
 
फिर कौन कहता है
के वो हमारे अपने ना थे?
 
– रोशन (Chilling Monk)
 
 

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